जिहाद शब्द का मतलब क्या है जानने की कोशिश करते हैं...

मौलाना महमूद मदनी साहब की पढ़ी गई तक़रीर पर उठ रहे सवाल पर बहस और एक शब्द "जिहाद" का मतलब क्या है, इसी सवाल का जवाब हम तलाश करते हैं कि "जिहाद" क्या है...?

"सम्पादकीय"
जवाब "जिहाद" (Jihad) एक अरबी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "संघर्ष करना" या "पूरी कोशिश करना" (to strive or struggle).

इस्लाम में जिहाद के मुख्यतः दो स्तर होते हैं...?
1. बड़ा जिहाद जिसको जिहादे अकबर कहा जाता है, यह आत्मिक/आंतरिक संघर्ष होता है, जैसे इसमें व्यक्ति अपने अंदर की बुराइयों, नफ्स (अहंकार), शैतान के वसवसों और गुनाहों से लड़ता है ताकि वह अल्लाह के करीब पहुंचे और अच्छा इंसान बने सके.

इसके लिए एक हदीस में आता है कि जब पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) जंग से लौटे तो फरमाया:
"हम छोटे जिहाद से लौटकर बड़े जिहाद की ओर जा रहे हैं।" (यानी नफ्स से लड़ाई).

2. दूसरा छोटा जिहाद (जिहादे असगर)
यह बाहरी संघर्ष है, जिसमें इस्लाम या मुसलमानों की रक्षा के लिए लड़ाई भी शामिल है.

लेकिन यह भी सख्त शर्तों के साथ है:
सिर्फ रक्षात्मक युद्ध (जब हमला हो)
निर्दोष नागरिकों, औरतों, बच्चों, बुजुर्गों, पूजा करने वालों को नुकसान न पहुंचाना
पेड़-पौधे, जानवर तक को नुकसान न पहुंचे
अमन संधि हो जाए तो लड़ाई बंद कर देनी चाहिए.

ये सिर्फ वैध इस्लामी हुकूमत ही घोषित कर सकती है, कोई भी व्यक्ति या ग्रुप अपने मन से "जिहाद" नहीं घोषित कर सकता.

अगर हम इसे आज के संदर्भ में लें तब ये गलतफहमी मीडिया और कुछ चरमपंथी ग्रुपों की वजह से "जिहाद" को सिर्फ "हिंसक युद्ध" या "आतंकवाद" समझ लिया जाता है, जो पूरी तरह गलत है, असली इस्लामी जिहाद में आतंकवाद, बेगुनाहों को मारना, जबरन धर्म परिवर्तन कराना सख्त मना है और ये इस्लाम के खिलाफ है.

इस्लाम में शांति (सलाम/अमान) बहुत ऊँचे दर्जे की चीज़ है। इस्लाम का नाम ही आया है अरबी जड़ “स-ल-म” से, जिसका मतलब है शांति, सुरक्षा, समर्पण और स्वस्थ रहना। इसलिए इस्लाम को “शांति का धर्म” कहा जाता है, लेकिन वह शांति जो अल्लाह के सामने पूर्ण समर्पण (इस्लाम) करने से मिलती है।

इस्लाम में शांति के कुछ प्रमुख सबूत और शिक्षाएँ:
सलाम ही अभिवादन है, मुसलमान एक-दूसरे को मिलते हैं तो कहते हैं: अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु.
अर्थ: “तुम पर शांति, रहमत और बरकत हो।”
जवाब में भी यही कहते हैं। यानी हर मुलाकात शांति की दुआ से शुरू होती है.

कुरान में बार-बार शांति का ज़िक्र
अल्लाह का एक नाम “अस-सलाम” है (कुरान 59:59:23) – यानी जो हर कमी-खराबी से पाक है और शांति का स्रोत है.
जन्नत वालों को फरिश्ते कहेंगे: “सलामुन अलैकुम” (शांति हो तुम पर) – (36:58)

पैगंबर इब्राहिम को दुआ सिखाई गई: “सल्लिमु तस्लमू” – तुम सलाम करो तो तुम्हें सलाम मिलेगा (शांति फैलाओ तो शांति पाओगे).

युद्ध भी सिर्फ मजबूरी में और सीमाओं के साथ
कुरान कहता है:

“अगर दुश्मन शांति की ओर झुकें तो तुम भी झुक जाओ” (8:61)

“लड़ाई सिर्फ उनसे करो जो तुमसे लड़ते हैं, और हद से आगे न बढ़ो” (2:190)

गैर-मुस्लिमों के साथ शांति का हुक्म, जिन गैर-मुस्लिमों से संधि हो, उनके साथ पूरा वफा करो (कुरान 9:4, 9:7)

जो तुमसे न लड़ें, उनके साथ अच्छा व्यवहार करो (60:8)

पैगंबर (स.अ.व.) ने मदीना में यहूदियों और ईसाइयों के साथ लिखित संविधान बनाया था जिसमें सबको धार्मिक आज़ादी और सुरक्षा का वादा था.

पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) की ज़िंदगी में शांति के बड़े उदाहरण
मक्का विजय के दिन (फत्ह मक्का) जब सारी क़ुरैश कांप रही थी, पैगंबर ने कहा:
“जाओ, आज तुम सब आज़ाद हो” – किसी को कोई सजा नहीं दी.
हुदैबिया की संधि: दुश्मनों ने बहुत अपमानजनक शर्तें रखीं, फिर भी पैगंबर ने शांति के लिए मान लिया। कुरान ने इसे “फत्हन मुबीन” (स्पष्ट विजय) कहा.

निचोड़ में:
इस्लाम शांति को इतना पसंद करता है कि:
जन्नत का दूसरा नाम “दारुस सलाम” (शांति का घर) है.

सबसे बड़ा इनाम शांति है।
दुनिया में भी मुसलमान का काम है कि वह अपने व्यवहार, बातचीत और यहाँ तक कि दुश्मनों से पेश आने में भी शांति फैलाए.

इस्लाम में शांति (सलाम) सिर्फ़ सिद्धांत नहीं, बल्कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ और सहाबा की ज़िंदगी में बार-बार अमल में दिखाई दी। यहाँ कुछ सबसे मज़बूत और ठोस ऐतिहासिक उदाहरण हैं:
1. फत्ह मक्का (मक्का की विजय) – 630 ई.
- 20 साल तक मक्कावालों ने मुसलमानों पर ज़ुल्म किए, मार डाला, घर से निकाला।  
 - जब पैगंबर ﷺ 10,000 साथियों के साथ बिना ख़ून-ख़राबे के मक्का में दाख़िल हुए तो पूरी ताक़त उनके हाथ में थी फिर भी उन्होंने ऐलान किया “आज बदले का दिन नहीं, आज तुम सब आज़ाद हो, जाओ, तुम पर कोई गुनाह नहीं.”  कुरैश के सबसे बड़े दुश्मन (जैसे अबू सुफ़ियान, हिंद, वहशी, इक्रिमा) सबको माफ़ कर दिया, इतिहास में इतनी बड़ी फत्ह के बाद इतनी व्यापक माफ़ी का दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है.

सुल्ह हुदैबिया (हुदैबिया की संधि) – 628 ई.
कुरैश ने बहुत अपमानजनक शर्तें रखीं:
इस साल मुसलमान हज नहीं करेंगे, अगले साल करेंगे.

अगर मक्का से कोई मुसलमान भागकर मदीना आएगा तो वापस करेंगे, लेकिन मदीना से कोई मक्का आएगा तो वापस नहीं करेंगे.

लिखित संधि में “मुहम्मद रसूलुल्लाह” नहीं लिखेंगे, सिर्फ़ “मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह” लिखेंगे. सहाबा को बहुत गुस्सा आया, लेकिन पैगंबर ﷺ ने शांति के लिए सब मान लिया.

कुरान ने इस संधि को “फत्हन मुबीन” (स्पष्ट विजय) कहा (सूरह अल-फत्ह)।

दो साल बाद पूरा अरब बिना लड़ाई के इस्लाम में दाख़िल हो गया.

मदीना संविधान (मिथाक़-ए-मदीना)
पैगंबर ﷺ ने मुसलमानों, यहूदियों और मूर्तिपूजक क़बीलों के बीच पहला लिखित संविधान बनाया।

सबको धार्मिक आज़ादी, जान-माल की हिफाज़त और आपसी सहायता का हक़ दिया, यह दुनिया का पहला लिखित संवैधानिक दस्तावेज़ माना जाता है जिसमें ग़ैर-मुस्लिमों को बराबर के नागरिक का दर्जा दिया गया.

ताइफ़ का बदला न लेना
ताइफ़ वालों ने पैगंबर ﷺ पर पत्थर मारे, पैरों से ख़ून बह निकला, आसमान से फरिश्ता आया और बोला: “अगर हुक्म हो तो दोनों पहाड़ों को मिलाकर ताइफ़ को कुचल दूँ...?”
पैगंबर ﷺ ने फरमाया: “नहीं, मैं उम्मीद करता हूँ कि इनकी औलाद में से कोई अल्लाह को एक मानने वाला निकलेगा,” बाद में पूरी ताइफ़ ने इस्लाम क़बूल कर लिया.

अबू बक्र रज़ि. का ज़ुल्म करने वालों को माफ़ करना
ख़िलाफ़त के समय एक क़बीला बग़ावत कर गया था, जब वापस आए तो अबू बक्र ने कहा: “हमने तुमसे सिर्फ़ इसलिए लड़ाई की थी कि तुम ज़कात देने से इनकार कर गए थे, अब तुम वापस आ गए हो, कोई सजा नहीं."

उमर रज़ि. और यरूशलम की चाबियाँ
637 ई. में यरूशलम फत्ह हुआ, ईसाई पादरियों ने कहा: “चाबियाँ सिर्फ़ ख़लीफ़ा को देंगे,” हज़रत उमर रज़ि. खुद मदीना से यरूशलम आए, एक ग़ुलाम को ऊँट पर बिठाकर खुद पैदल चले, शहर में दाख़िल होते ही ईसाइयों-यहूदियों को पूरी धार्मिक आज़ादी और सुरक्षा का लिखित वादा दिया.

चर्च ऑफ़ होली सेपुल्कर में नमाज़ के लिए जगह दी गई तो उमर ने इनकार कर दिया कि “कहीं मुसलमान बाद में इसे मस्जिद न बना लें।” बाहर जाकर नमाज़ पढ़ी.

पैगंबर ﷺ का रोज़मर्रा का व्यवहार
पड़ोसी यहूदी बच्चा बीमार हुआ तो पैगंबर ﷺ उससे मिलने गए.
एक यहूदी औरत रोज़ कूड़ा फेंकती थी रास्ते में; जब एक दिन नहीं फेंका तो पैगंबर ﷺ खुद उसके घर पूछने गए.

संक्षेप में: इस्लाम में शांति सिर्फ़ किताबी बात नहीं, बल्कि पैगंबर ﷺ और खुलफ़ाए-राशिदीन की ज़िंदगी का सबसे चमकदार हिस्सा है।
जब भी पूरी ताक़त हाथ में आई, उसका इस्तेमाल बदला लेने में नहीं, माफ़ करने और अमन क़ायम करने में किया गया।

यहाँ दुनिया के प्रमुख धर्मों में शांति की मूल शिक्षाएँ और उनके सबसे ख़ूबसूरत उदाहरण बहुत संक्षेप में दिए जा रहे हैं:

हिन्दू धर्म
अहिंसा परमो धर्मः (महाभारत) वसुधैव कुटुम्बकम् (पूरी दुनिया एक परिवार है)
महात्मा गांधी ने पूरे स्वतंत्रता आंदोलन को अहिंसा से जीत लिया, बिना एक भी गोली चलाए।

बौद्ध धर्म
पाँच शीलों में पहला शील: प्राणी मात्र की हिंसा न करना मैत्री और करुणा सबके लिए
सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद तलवार त्याग दी, पूरे एशिया में शांति और धर्म का प्रचार किया।

जैन धर्म
अहिंसा सबसे ऊँचा धर्म है, यहाँ तक कि छोटे-छोटे जीवों को भी नहीं मारना
जैन मुनि सूक्ष्म जीवों को बचाने के लिए मुँह पर कपड़ा बाँधते हैं और रात में नहीं चलते (कीड़े न मरें)

सिख धर्म
ਸਰਬਤ ਦਾ ਭਲਾ (सबका भला) देग-तेग-फ़तेह (सबको खिलाओ, सबकी रक्षा करो, विजय हो)
गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगज़ेब को ज़फरनामा लिखकर भी शांति और न्याय की बात की; गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए अपना सिर दिया।

ईसाई धर्म
“जो गाल पर थप्प्पड़ मारे, दूसरा गाल आगे कर दो” (मत्ती 5:39) “अपने दुश्मनों से प्रेम करो”
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में नस्लभेद के ख़िलाफ़ पूरी लड़ाई अहिंसा से लड़ी।

यहूदी धर्म
शालोम (शांति) ही अभिवादन है “तलवारें हल के फाल बन जाएँगी” (यशायाह 2:4)
1978 में इज़राइल के प्रधानमंत्री मेंाहेम बेगिन और मिस्र के अनवर सादात ने कैंप डेविड समझौता करके शांति नोबेल जीता।

बहाई धर्म
पूरी मानवजाति एक है, सब धर्म एक ही सत्य के अलग-अलग रंग हैं
बहाउल्लाह ने 19वीं सदी में सभी राजाओं-बादशाहों को पत्र लिखकर विश्व-शांति और एक विश्व सरकार की वकालत की।

पारसी (ज़रथुस्त्र)
हमता (अच्छे विचार), हूख्ता (अच्छे शब्द), ह्वरश्ता (अच्छे कर्म)
सन् 1947 विभाजन के समय पारसियों ने न किसी का पक्ष लिया, न विपक्ष, बस शरणार्थियों की सेवा की।
एक सामान्य बात
हर बड़े धर्म की मूल शिक्षा में शांति, करुणा और अहिंसा है।

जब-जब हिंसा हुई है, वह धर्म की शिक्षा के ख़िलाफ़ राजनीतिक, आर्थिक या व्यक्तिगत स्वार्थों की वजह से हुई है, न कि धर्म की मूल शिक्षाओं की वजह से।

अगर आप किसी एक धर्म की शांति-संदेश को और गहराई से जानना चाहें तो बतायें...?

यानि संक्षेप में कहें तो:
जिहाद = किसी नेक मकसद के लिए पूरी कोशिश करना, जिसमें सबसे बड़ा जिहाद तो अपने अंदर की बुराइयों से लड़ना है, अगर आप किसी खास पहलू या संदर्भ में और जानना चाहते हैं तो हमें बताइए, हम कोशिश करेंगे आपको सही जवाब मिल सके...
फ़रीद भारतीय
सम्पादक नेशनल न्यूज़ 24 नेटवर्क इंडिया

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