क्यूं तख़्ता पलट हुआ शेख हसीना सरकार का...?
"हम बता दें कि पिछले महीने जुलाई में हुई हिंसा में 200 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें से कई लोगों की मौत पुलिस की गोली से हुई थी." यहीं से शेख हसीना सरकार को गिराने की बुनियाद रखी गई.
बांग्लादेश में आबादी का बड़ा हिस्सा युवाओं का है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि बांग्लादेश की 45 प्रतिशत आबादी 24 साल से कम उम्र की है.
पिछले कुछ वक्त से बांग्लादेश में शेख़ हसीना सरकार के लिए सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा था, ख़ासकर विदेश नीति को लेकर, विदेश मोर्चे पर भी भारत और चीन के बीच संतुलन की सरकार की नीति सटीक नहीं बैठ रही थी, पिछले महीने चीन के दौरे पर गईं शेख़ हसीना तय समय से पहले ही वापस आ गई थीं.
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी मीडिया से कहती हैं कि चीन में शेख़ हसीना को उचित सम्मान नहीं दिया गया, शी जिनपिंग के साथ वो जो बैठक चाहती थीं वो भी नहीं हो पाई.
वीना कहती हैं, ''ये नहीं समझ आता कि चीन की सरकार ने आख़िर क्या सोचकर ऐसा किया. क्योंकि उस दिन तक चीन की सरकार, बांग्लादेश की सरकार के साथ दोस्ताना रिश्ते दिखा रही थी और ऐसे बयान भी दे रही थी.''
चीन से वापस आते ही शेख़ हसीना ने भारत के लिए एक बड़ा एलान कर दिया था. शेख़ हसीना का कहना था कि तीस्ता परियोजना में भारत और चीन दोनों की दिलचस्पी थी लेकिन वह चाहती हैं कि इस परियोजना को भारत पूरा करे.
जिस पर हसीना ने कहा था, ''चीन से हमारे संबंध अच्छे हैं. इससे पहले मैं भारत दौरे पर गई थी, तब कहा गया कि मैंने देश भारत को बेच दिया है. मैं चीन गई तो कुछ हासिल नहीं हुआ. ये सब बयान आते रहते हैं. मुझे लगता है कि लोग मानसिक रूप से बीमार हैं.''
शेख़ हसीना के भारत और चीन पर दिए बयान को अभी एक महीने भी पूरे नहीं हुआ था कि शेख़ हसीना सत्ता से बेदखल हो गईं हैं. 5 अगस्त का दिन बांग्लादेश के लिए इतिहास बदलने वाला साबित हुआ.
आरक्षण पर चल रहे हिंसक प्रदर्शनों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में तब्दील हो जाने के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने देश छोड़ दिया.
ढाका में हज़ारों लोगों की भीड़ के सामने छात्र नेताओं में से एक नाहिद इस्लाम ने कहा, शेख़ हसीना को केवल इस्तीफ़ा ही नहीं देना चाहिए, बल्कि उनके ख़िलाफ़ हत्याओं, लूट और भ्रष्टाचार के लिए मुकदमा चलाना चाहिए.
वहीं प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने कहा है कि आंदोलनकारी छात्र जो आगजनी हिंसा में शामिल लोग छात्र नहीं टेररिस्ट हैं, यहीं से सब खेल बिगड़ गया, क्यूंकि सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ''आतंकी हमलों'' की चेतावनी वाला बयान जारी किया था.
वहीं पूर्व आर्मी चीफ़ इक़बाल करीब भूईयां ने एक लिखित बयान जारी कर कहा, "यह ज़रूरी है कि सशस्त्र बल तुरंत अपने मिलिट्री कैंपों में लौट जाएं और किसी भी इमरजेंसी हालात से निपटने के लिए तैयार रहें."
उन्होंने इसके साथ ही इलाक़ों में तैनात सशस्त्र बलों के सदस्यों से जनता का साथ देने की उन्होंने अपील की, उन्होंने उन्हें वापस कैंपों में लौटने की अपील करते हुए कहा, "हम खुद से नहीं लड़ सकते. हम देश को जंग का मैदान नहीं होने दे सकते."
छात्रों का आंदोलन था कि 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए लड़ने वालों स्वतंत्रता सेनानियों के रिश्तेदारों के लिए कई सिविल सेवा नौकरियों में दिए गए आरक्षण को लेकर पिछले महीने छात्र सड़कों पर उतर आए थे.
जुलाई में हुई हिंसा में 200 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें से कई लोगों की मौत पुलिस की गोली से हुई थी, पिछले दो सप्ताह में सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई में कथित तौर पर लगभग 10,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें विपक्षी समर्थक और छात्र प्रदर्शनकारी भी शामिल थे.
इसके बाद ही मांफ़ी के बजाय बांग्लादेश के सूचना राज्य मंत्री मोहम्मद अली अराफात ने कहा, हमने बहुत धैर्य रखा है. अगर प्रधानमंत्री आह्वान करेंगी तो अवामी लीग के कार्यकर्ता और देश भर के कई लोग सड़कों पर उतरेंगे. लेकिन हम संघर्ष में नहीं पड़ना चाहते. हालाँकि अगर आतंकवादी आतंकवाद फैलाते हैं तो क़ानून लागू किया जाना चाहिए, यानि आन्दोलनकारी आतंकवादी हैं...
फिर क्या था देश मैं सभी लोग सड़क पर छात्रों का साथ देने निकल आये और तब शेख हसीना को ख़ुफ़िया जानकारी मिली कि मामला अब बिगड़ चुका है, लिहाज़ा आप 45 मिनट मैं बंगलादेश से निकल जाओ वरना बहुत बुरा हो सकता है...तब शेख हसीना को इस्तीफ़ा देकर देश से भागना पड़ा...!
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